
चुनाव सुधार के लिए काम करने वाली संस्था एडीआर के बिहार प्रमुख राजीव कुमार जाति के आधार पर वोट की तलाश करने वाले दलों को आगाह करते हैं। वे कहते हैं कि बिहार को लेकर नजरिया बदलने की जरूरत है। जाति सबसे ऊपर होती तो कर्पूरी ठाकुर, श्रीबाबू और नीतीश कुमार को इतनी प्रतिष्ठा नहीं मिलती, क्योंकि उक्त तीनों नेता जिस-जिस जाति का प्रतिनिधित्व करते आए हैं, उनकी संख्या बहुत कम है। लालू प्रसाद को कुछ हद तक इसलिए कामयाबी मिल गई कि उन्होंने जातियों का समीकरण बनाया था। लेकिन वोटरों की मानसिकता बदली तो उन्हें भी हाशिये पर जाते देर नहीं लगी।
*बिहार की जातिगत राजनीति का एक सच यह भी: केवल 12 जातियों में ही दिखती सियासी सक्रियता*
बिहार की सियासत में जाति एक कड़वी सच्चाई है, लेकिन पूरी तरह नहीं। जातीय जनगणना के लिए विधानसभा से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजने वाले बिहार की राजनीति में जातियों के आंकड़े हैरान करने वाले हैं। बिहार में सवा दो सौ से ज्यादा जातियां हैं, लेकिन इनमें मुख्य तौर पर 10-12 ही सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेतीं हैं। टिकट के लिए मारामारी भी इन्हीं के बीच होती है। अन्य जातियों का स्थान दर्शक दीर्घा में होता है।
एक सच यह भी है कि आजादी से अबतक राज्य की 20 जातियों के प्रतिनिधि ही संसद तक पहुंच सके हैं। बाकी को सांसद बनने का मौका तक नहीं मिला है। हां, बिहार विधानसभा में यह फलक थोड़ा ही बड़ा है।
*दो सौ जातियों का किसी सदन में प्रतिनिधित्व नहीं*
जातीय जनगणना के सहारे अपने वोट बैंक में इजाफा की उम्मीद लगाने वाले दलों को यह आंकड़ा सबक देगा कि पिछले लोकसभा चुनाव में भी बड़े दलों ने सिर्फ 21 जातियों को ही टिकट के लायक समझा। यह बिहार में जातियों की कुल संख्या का महज 10 फीसद है। यानि 90 फीसद को टिकट का हकदार नहीं माना गया। करीब दो सौ जातियां हैं, जिनका प्रतिनिधित्व अभी तक किसी सदन में नहीं हो सका है।
*फलक बड़ा करें बिहार को जातीय चश्मे से देखने वाले*
सामाजिक व राजनीतिक विश्लेषक चौ.लौटन निषाद कहते हैं कि बिहार को जातीय चश्मे से देखने वाले अपने फलक को बड़ा कर लें। अगर ऐसा होता तो जॉर्ज फर्नांडीज, मीनू मसानी, जेबी कृपलानी,शरद यादव और मधु लिमये जैसे बाहरी नेताओ को बिहार से संसद जाने का मौका नहीं मिल पाता। बिहार के वोटरों ने उनकी जाति नहीं, संभावनाएं देखकर अपना प्रतिनिधि चुना।
*अबतक केवल 20 जातियों को ही मिला मौका*
श्रीकांत की पुस्तक बिहार में चुनाव, जाति और बूथ लूट के आंकड़े बताते हैं कि 1952 से अबतक यादव, ब्राह्म ण, राजपूत, कायस्थ, भूमिहार, कुर्मी, कोइरी, बनिया, कहार, नाई, धानुक, नोनिया, मल्लाह, विश्वकर्मा, पासवान, मांझी, पासी, रविदास, मुस्लिम और ईसाई समुदाय से ही सांसद चुने गए हैं। बाकी को इंतजार है।
*राजनीति में अति सक्रिय जातियां*
यादव, भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, कोईरी, कुर्मी, रविदास,दुसाध,पासी,मुसहर, बनिया, कहार, धानुक, मल्लाह,नाई।
*बिहार में कुल जातियां- एक नजर*
बिहार में अनुसूचित जातियों की संख्या- 37,अनुसूचित जनजातियों की संख्या-33,अति पिछड़ा वर्ग-113,पिछड़ा वर्ग- 31,सवर्ण जातियों की संख्या -7 हैं।
*जाति निभाती है बिहार की राजनीति में अहम किरदार, क्या कम हुआ है सवर्णों का वर्चस्व*
चुनाव के अंतिम दिन विकास पर जाति का समीकरण भारी पड़ता है। इसलिए राजनीतिक दल इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारते हैं।
बिहार की राजनीति हमेशा से अलग रही है. यहां की राजनीति में जाति का गणित काफी अहम है और एक कड़वी सच्चाई है कि चुनाव के अंतिम दिन विकास पर जाति का समीकरण भारी पड़ता है। इसलिए राजनीतिक दल इसी जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर उम्मीदवार उतारते हैं।बिहार की राजनीति का विशलेषण करने वालों के मुताबिक हर दशक में अलग-अलग जातियां चुनावी दिशा को तय करती हैं।1977 तक बिहार की सियासत में सवर्णों का बोलबाला रहा लेकिन बाद के बरसों में सवर्णों की जगह दलित और पिछड़ी जातियों ने ले ली और अब राजनीति भी दलित और पिछड़ों के इर्द-गिर्द तक सिमट कर रह गई है।
सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ कि कभी राजनीति के शीर्ष में अहम भूमिका निभाने वाला सवर्ण समुदाय अब राजनीति में सिर्फ रस्म अदायगी भर की होकर गई है।श्रीकृष्ण सिंह, दीप नारायण सिंह,पंडित बिनोदानंद झा, केदार पांडेय, बिन्देश्वरी दूबे,भागवत झा आजाद,जगन्नाथ मिश्र वो नाम हैं जिन्होंने बिहार में मुख्यमंत्री पद के तौर पर राज किया और ये सभी सवर्ण समुदाय से हैं।
*बिहार का जातिगत समीकरण* (कुल आबादी में है किस जाति का कितना हिस्सा)
1.मुस्लिम -14.7%
2.यादव 14.4%
3.ब्राह्मण-5.7%
4.महादलित-10.3%
5.दलित(दुसाध)-3.9%
6.कायस्थ- 1.5%
7.भूमिहार- 4.7%
8.राजपूत -5.2%
9.कुर्मी- 2.5%
10.कोयरी-3.25%
11.बनिया -7.1%
12.अत्यंत पिछड़े वर्ग की जातियाँ-26.85%हैं,जिसमे मल्लाह/निषाद समूह(मल्लाह,बिन्द, नोनिया,कामत,तियर, गंगौता,सोरहिया,कुलवट आदि)-13.10% हैं।
*बिहार में सत्ता के लिए जाति और गठबंधन की राजनीति हो गयी है जरूरी*
बिहार विधानसभा चुनाव-2020 में बह रही चुनावी बयार से राजनैतिक माहौल बेहद गर्म हैं। कोरोनाकाल में होने वाले पहले चुनाव के कारण इस बार राज्य में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन और नए फैक्टर देखने को मिलेंगे।
लेकिन, बिहार में सबसे बड़ा फैक्टर है यहां के जातीय समीकरण। वैसे तो पूरे भारत में किसी भी राज्य में जातीय समीकरण की अहम भूमिका होती है लेकिन बिहार के मामले कहा जा सकता है कि यहां यही एक मात्र फैक्टर है, जो सरकार बनाता भी है और बिगाड़ता भी है।
बिहार की राजनीति जातिवाद आधारित है। इसी के चलते लगभग सभी दल सभी जातियों को ध्यान में रखते हुए ही कोई फैसला करते हैं। यहां जातिवाद कितना प्रबल है इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कि बिहार ही में आजादी के पहले जनेऊ आंदोलन हुआ और इसी राज्य में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति आंदोलन में ‘जाति छोड़ो, जनेऊ तोड़ो’ का नारा लगवाया था।
पिछड़ों को नेतृत्व देने वाली बिहार सरकार के नेता कर्पूरी ठाकुर को नेता बनाने वाले राममनोहर लोहिया ने पहली बार पिछड़ों के आरक्षण की मांग करते हुए नारा दिया था- ‘संसोपा ने बांधी गांठ, पिछड़े पावें सौ में साठ’।
1967 में बिहार विधानसभा और लोकसभा का चुनाव एक साथ हुआ। उसके पहले ही बिहार के जटिल समाजी-सियासी ताने-बाने टूटने लगे थे और इस जातिगत सत्ता-स्थानांतरण की मुख्य वजह रही दलितों और सवर्णों के राजनैतिक टकराव। यहीं से बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी शुरू हो गया था। बिहार राजनीतिक रूप से इतना अस्थिर रहा है कि यहां अब तक 8 बार राष्ट्रपति शासन लग चुका है।
बिहार में सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ होने वाले राजनीतिक बदलाव की एक बानगी यह भी है कि यहां अब तक 12 सवर्ण, 6 पिछड़े वर्ग से, 3 दलित वर्ग से और एक मुस्लिम मुख्यमंत्री रहे हैं। इस प्रदेश में 5 दिन के मुख्यमंत्री से लेकर 14 वर्ष से भी अधिक मुख्यमंत्री बने रहने के रिकॉर्ड भी दर्ज हैं।
इसी तरह 1990 में मंडल कमीशन रिपोर्ट लागू होने के बाद से ही बिहार में जातीय समीकरण तेजी से बदले और पिछड़े वर्ग में बढ़ती राजनीतिक जागरूकता के चलते मतदाताओं में जाति आधारित क्षेत्रीय दलों के प्रति प्रतिबद्धता बढ़ने लगी।
नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुमान के मुताबिक, बिहार की आधी से अधिक जनसंख्या पिछड़े वर्ग से आती है। इसी तरह राज्य में दलित और मुसलमान भी बड़े समुदाय हैं। बिहार में मुसलमान भी सामाजिक आधार पर वह कई हिस्सों में बंटे हैं, जिनमें पिछड़े मुसलमानों की संख्या अधिक है।
यही कारण है कि बिहार का राजनैतिक इतिहास देखें तो पता चलता है कि 1990 के बाद हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों से स्पष्ट है कि यदि यहां गठजोड़ की राजनीति क्यों हावी है? यदि सभी राजनैतिक दल अकेले चुनाव लड़ें तो बिहार में खंडित जनादेश ही आएगा और कोई सरकार नहीं बना पाएगा।
राज्य की राजनीति में भाजपा व कांग्रेस जैसे दो राष्ट्रीय दल और राजद व जदयू सरीखे दो ताकतवर क्षेत्रीय दल में से कोई भी पिछले 30 वर्षों में हुए चुनावों में एक बार भी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू सका है।
इसका एक बड़ा कारण है कि बिहार में मतदाता जाति के आधार पर बंटे हुए हैं। 1990 के दशक में भाजपा के हिंदुत्व की काट के लिए लालू यादव ने लोहियावाद से आगे बढ़कर ‘कास्ट अलाइननमेंट’ करते हुए मुस्लिम-यादव (माईवाद) के ‘माय समीकरण’ से सत्ता की सीढ़ी चढ़ी। इसी समीकरण को भांपते हुए बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी सोशल इंजीनियरिंग आधारित जो ‘न्यू कास्ट अलाइनमेंट’ राजनीतिक पैटर्न अपनाया, वह बिहार की राजनीति में पहले भी सफलता पूर्वक आजमाया हुआ था।
*बिहार चुनाव में खूब होंगे वार-पलटवार,इन 5 मुद्दों पर होगी नेताओं की परीक्षा*
बिहार के प्रमुख क्षेत्रीय दलों जदयू और राजद का आधार मूलत: कुर्मी और यादव वोटों में है। वहीं रामविलास पासवान की लोजपा और जितनराम माँझी की हम का मूल आधार दलित वोट हैं। इसी तरह दो बड़े राष्ट्रीय दलों भाजपा के पास सवर्ण और कांग्रेस के पास सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं का बंटा हुआ वोट बैंक है।
*बिहार की राजनीति के 5 दमदार खिलाड़ी तय करेंगे किसके हाथ में होगी सत्ता*
2015 में भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी लोजपा एवं राष्ट्रीय लोक समता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद ने ‘महागठबंधन’ बनाया था। हालांकि यह सरकार अल्पजीवी साबित हुई और नीतीश कुमार ने सत्ता में बने रहने के लिए एक बार फिर भाजपा नीत एनडीए से हाथ मिला लिया।
यही कारण है कि बिहार में गठबंधन ही इस चुनाव में भी सफलता का सूत्र साबित होगा। बिहार की जातिगत राजनीति को देखते हुए जहां तेजस्वी यादव को कांगेस की जरूरत है वहीं भाजपा के साथ बने रहना नीतीश कुमार की जरूरी ‘राजनैतिक मजबूरी’ है।
*(चौ.लौटन निषाद)*
(लेखक सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष हैं,जिन्हें राम पर टिप्पणी के सवाल पर पद से हटा दिया गया है।ये सामाजिक व राजनीतिक विश्लेषक व समीक्षक है)





