
नवंबर माह में ही राष्ट्रपति ने 2020 और 2021 के पद्म पुरस्कारों का वितरण किया जिनमें कई नामों को लेकर विवाद भी रहा। हालांकि इन विवादों में एक नई कड़ी तब जुड़ गई जब 2022 के लिए पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकित दो हस्तियों ने ही इन पुरस्कारों पर सवाल उठा दिए।
जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता और चिकित्सक डॉ मनीषा बांगर और वरिष्ठ लेखक एच एल दुसाध ने इन पुरस्कारों पर जातीय भेदभाव का आरोप लगाए और कहा कि इन पुरस्कारों में सामाजिक न्याय की आवाज़ उठाने वालों की लगातार अनदेखी की जाती है, और यह भी कहा कि क्षेत्रीय आधार पर भी भेदभाव किया जाता है।
डॉ मनीषा बांगर ने लगाया भेदभाव का आरोप
सामाजिक कार्यकर्ता डॉ मनीषा बांगर ने कहा है कि तेलंगाना के साथ इन पुरस्कारों में अजीब तरह का व्यवहार किया जा रहा है। जब तक चुनाव थे, तब तक तेलंगाना के लोगों को दोनों हाथों से पुरस्कार बांटे जा रहे थे, लेकिन जब तेलंगाना की जनता ने विधानसभा चुनावों में भाजपा का साथ नहीं दिया तो अब इस राज्य की एकदम अनदेखी की जाने लगी है।
पेशे से डॉक्टर मनीषा बांगर हैदराबाद की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त किडनी ट्रांसप्लांट स्पेशलिस्ट हैं, और पिछले दो दशकों से राजनीतिक, सामाजिक और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम कर रही हैं। तेलंगाना के प्रतिष्ठित ईश्वरीबाई पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी डॉ मनीषा बांगर को पिछले कई सालों से उन्हें पद्मश्री देने की मांग उठती रही है।
डॉ मनीषा कहती हैं कि जब तक भाजपा को उम्मीद रही कि तेलंगाना की जनता उसे समर्थन दे सकती है तब तक उसने तेलंगाना के लोगों को काफी उदारतापूर्वक पद्म पुरस्कार बांटे लेकिन जब जनता ने चुनावों में उसे घास नहीं डाली तो अब भाजपा की निगाहें टेढ़ी हो गई हैं।हालांकि डॉ मनीषा बांगर यह भी कहती हैं कि क्षेत्रवाद के साथ-साथ जातिवाद भी इन पुरस्कारों में बड़ा मसला है और ये स्थिति नेहरू तथा कांग्रेस के शासनकाल से ही चली आ रही है।
डॉ मनीषा बांगर कहती हैं कि आलोचनाओं से बचने के लिए दायरा तो बढ़ाया गया है और कई कलाकारों और विद्वानों को पद्मश्री की सूची में शामिल किया जाने लगा है, लेकिन फिर भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग इन पुरस्कारों के योग्य नहीं माने जाते जो वास्तव में धरातल पर योगदान दे रहे हैं।
ध्यान देने की बात है कि डॉक्टर मनीषा बांगर को साल 2022 के पद्मश्री पुरस्कार के लिए कई राष्ट्र स्तरीय सामाजिकसंगठनों , तेलंगाना और दिल्ली के अनेक वरिष्ठ पत्रकारों , स्वास्थ सेवा में कार्यरत कलिंग फाउंडेशन और लगभग 25 अन्य प्रतिष्ठित सम्मानित नागरिकों ने नामांकित किया है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने भी लगाया है आरोप
तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव भी इस तरह का आरोप लगा चुके हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार तेलंगाना के लोगों को प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित नहीं कर रही है और उनकी “अनदेखी” कर रही है। ध्यान देने की बात है कि 2021 के पद्म पुरस्कारों में तेलंगाना के केवल कला जगत के कनक राजू का नाम ही शामिल रहा है।
लगातार बढ़ी है तेलंगाना की अनदेखी
इसके पहले 2020 में तेलंगाना की तीन विभूतियों को ही पद्म पुरस्कार दिए गए थे। बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधू,प्रगतिशील किसान चिंतला वेंकट रेड्डी औरसाहित्यकार विजयसारथी श्रीभाष्यम को पद्मश्री दिया गया था। पद्म भूषण और पद्म विभूषण में तेलंगाना का कोई नाम नहीं था।इसी तरह 2019 में भी तेलंगाना के केवल दो लोगों को पद्म पुरस्कारों की सूची में जगह मिल पाई थी। इनमें फुटबॉल खिलाड़ी सुनील छेत्री, औरकवि श्रीवेन्नला सीताराम शास्त्री को पद्मश्री लायक मान लिया गया था। 2018 में तो तेलंगाना के किसी भी व्यक्ति को पद्म पुरस्कार लायक नहीं माना गया था।
2017 में भाजपा को वोट न देने की सजा?
हैरानी की बात है कि 2017 में यानी तेलंगाना विधानसभा चुनावों से पहले तेलंगाना के 7 लोगों को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उन चुनावों में भाजपा ने तेलंगाना में उसी तरह से ताकत लगाई थी जिस तरह से उसने इस साल के शुरू में पश्चिम बंगाल के चुनावों में जोर लगाया था।माना जा रहा है कि तब तेलंगाना की जनता को लुभाना था इसलिए वहां के 7 लोगों को पद्मश्री से नवाजा गया था। इसकी तैयारी की झलक 2016 में भी दिखी थी। तब तेलंगाना के 9 लोगों को पद्म पुरस्कार दिए गए थे, जिनमें से 5 पद्मश्री के अलावा 1 पद्मविभूषण और 4 पद्मभूषण तक शामिल थे।
ऐसा लगता है कि चुनावों से पहले के सालों में भाजपा सरकार को तेलंगाना में लगातार प्रतिभाएं दिख रही थीं, लेकिन जब जनता ने विधानसभा चुनावों में भाजपा को नकार दिया तो केंद्र सराकर ने 2018 में तेलंगाना को एकदम किनारे कर दिया। 2019 में केवल 2 को जगह दी और 2020 में जरूर 3 को चुना लेकिन 2021 में फिर से केवल एक को जगह दी गई।
अन्य राज्यों का पद्म पुरस्कारों में हिस्सा
क्षेत्रीय आधार पर देखें तो जहां 2021 में तेलंगाना को केवल एक पद्मश्री दिया गया, वहीं, असम को 9 पद्मश्री और एक पद्मभूषण मिल गया। उत्तर प्रदेश को 7 पद्मश्री और 2 पद्मभूषण मिले। उत्तराखंड को भी दो पद्मश्री मिल गए।पश्चिम बंगाल में चुनावों में राजनीतिक लाभ लेना था तो भाजपा सरकार ने 6 पद्मश्री बंगाल से चुने और एक पद्मश्री बांग्लादेश से भी चुन लिया। अन्य छोटे प्रदेशों में हरियाणा से एक पद्मभूषण और 2 पद्मश्री चुने गए। दिल्ली जैसे केंद्रशासित प्रदेश से भी 2 पद्मविभूषण और 4 पद्मश्री चुने गए, जिससे पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेता शरद यादव की बात सही साबित होती है कि सत्ता के करीब लोगों की इन पुरस्कारों तक पहुंच ज्यादा होती है।
शरद यादव ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक और किसान समुदाय के लोगों को ऐसे पुरस्कारों से आमतौर पर वंचित रखे जाने का आरोप लगाया था और कहा था कि ये पुरस्कार उन मुट्ठी भर लोगों के लिए रह गए हैं जो सरकार के करीब रहते हैं।
एचएल दुसाध ने उठाई पुरस्कारों में डाइवर्सिटी की मांग
जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता एचएल दुसाध का भी नाम कई संगठनों ने पद्मश्री के लिए भेजा है। श्री दुसाध का कहना है कि वास्तव में सत्ता, प्रशासन और पुरस्कार समेत हर क्षेत्र में हर स्तर पर डाइवर्सिटी लागू होनी चाहिए, और सभी जातियों को तथा सभी प्रांतों को यथोचित हिस्सा मिलना चाहिए।बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के संस्थापक श्री दुसाध हर स्तर पर सभी स्रोतों में डाइवर्सिटी लागू करने की मांग उठाते रहे हैं और अब तक तकरीबन सौ किताबें लिख चुके हैं।
श्री दुसाध कहते हैं कि मौजूदा सरकार तो हर मोर्चे पर निराश कर रही है तो पुरस्कार वितरण में तो कोई उम्मीद की ही नहीं जा सकती। इसके बावजूद मेरे प्रशंसकों ने मेरा नाम पद्मश्री के लिए भेजा है तो इसे पुरस्कारों में भी डाइवर्सिटी लागू करने के दावे के रूप में देखा जाना चाहिए।
डॉ लियो रेबेलो का चर्चित मामला
पद्म पुरस्कारों के लिए नामांकित हो चुके दो दिग्गजों ने जिस तरह से इन पुरस्कारों पर सवाल उठाया है, उससे मुंबई के चर्चित नैचुरोपैथ डॉ लियो रेबेलो का मामला याद आता है।डॉ लियो रेबेलो के साथ तो बहुत बड़ा खेल हुआ था और यह मामला काफी चर्चित भी हुआ था। 1991 में उनका नाम पद्मश्री के लिए चुना गया था, लेकिन पुरस्कार समारोह के तीन दिन पहले उनका नाम गायब कर दिया गया था। इसके खिलाफ डॉ रेबेलो हाईकोर्ट भी गए थे।
बाद में भी डॉ रेबेलो लगातार ये आवाज़ उठाते रहे हैं कि पद्म पुरस्कार काबिल लोगों को छोड़कर, ऐसे लोगों को दिए जा रहे हैं जिनका समाज में कोई योगदान नहीं रहा है।डॉ रेबेलो ने 2010 में एनआरआई होटल व्यवसायी संत सिंह चटवाल, अपोलो अस्पताल के डॉ प्रकाश रेड्डी को पद्म भूषण और अभिनेता सैफ अली खान को पद्मश्री दिए जाने का भी विरोध किया था और कहा था कि इन लोगों को देश और समाज के लिए कोई योगदान नहीं रहा है, और मनमाने तरीके से इन्हें पुरस्कार दिए गए।
पद्म पुरस्कारों के बारे में कहा जाता रहा है कि इनमें हर बार बिना किसी खास योगदान वाले अभिनेता-अभिनेत्रियों को तरजीह मिलती है, और किस अभिनेता या अभिनेत्री को पुरस्कृत करना है, इसका कोई स्पष्ट मानदंड भी नहीं है।
इस बार से नियमों में हुआ है बदलाव
इस बार से पद्म पुरस्कारों के नियमों में बदलाव किया गया है और अब कोई भी इन पुरस्कारों के लिए किसी का भी नामांकन कर सकता है। इसे अच्छा कदम माना जा सकता है लेकिन नामांकनों की जांच और चयन का तरीका अगर पहले जैसा ही रहता है तो फिर इस बदलाव का कोई मतलब नहीं रहेगा।बहरहाल, इस बार एससी, एसटी, अल्पसंख्यक और ओबीसी के तमाम कलाकारों, साहित्यकारों, इंजीनियरों, डॉक्टरों, खिलाड़ियों आदि के नाम पद्म पुरस्कारों के लिए भेजे गए हैं, और अगर सरकार सभी पर ईमानदारी से ध्यान दे तो अगले साल के पुरस्कार विवादों से परे हो सकते हैं। ऐसा होने पर ही इन पुरस्कारों का सम्मान बहाल हो सकेगा।





