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Thursday, September 3, 2026
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बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत: वाशिम के छात्र हरिस अकबानी को दिया जाए ‘कच्छी OBC’ जाति वैधता प्रमाण पत्र

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नागपुर |बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने वाशिम निवासी 18 वर्षीय छात्र हरिस अमीन अकबानी को राहत देते हुए अनुसूचित जनजाति जाति प्रमाण पत्र स्क्रूटनी कमेटी (वाशिम) द्वारा खारिज किए गए उसके ‘कच्छी OBC’ जाति दावे को सही ठहराया है। अदालत ने कमेटी के निर्णय को रद्द करते हुए आठ सप्ताह के भीतर हरिस को जाति वैधता प्रमाण पत्र जारी करने का आदेश दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के एवं न्यायमूर्ति राज डी. वाकोड़े की खंडपीठ ने सुनाया।

क्या था पूरा मामला? कारंजा (वाशिम) निवासी छात्र हरिस अकबानी ने अपनी 12वीं की परीक्षा दी है और वह नीट (NEET) के जरिए आगे की मेडिकल पढ़ाई की तैयारी कर रहा है। आगे के प्रवेश के लिए जाति वैधता प्रमाण पत्र की जरूरत थी। हरिस ने अपने कॉलेज के माध्यम से जांच समिति में आवेदन किया था। उसने 1967 की कट-ऑफ तारीख से पहले के दस्तावेज और अपने चचेरे भाई फैजान को जारी जाति वैधता प्रमाण पत्र भी साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किए थे। इसके बावजूद समिति ने 20 अप्रैल 2026 को प्रतिकूल प्रविष्टियों का हवाला देकर उसके दावे को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ हरिस ने एडवोकेट वेदांत पांडे के जरिए हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां:

  • पुराने साक्ष्यों की साख: कोर्ट ने माना कि कट-ऑफ तिथि (13.10.1967) से पहले दादा की बहन रुखसाना (1962 का दस्तावेज) और परदादा के जन्म रिकॉर्ड में “कच्छी” दर्ज है, जिनका साक्ष्य मूल्य अधिक है।

  • रक्त-संबंधी का फैसला लागू: ‘अपूर्वा निछाले’ मामले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि यदि किसी सगे रक्त-संबंधी को समान दस्तावेजों पर वैधता मिली है और उसमें कोई धोखाधड़ी नहीं पाई गई, तो उसी परिवार के दूसरे सदस्य को प्रमाण पत्र देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

  • विजिलेंस रिपोर्ट का समर्थन: कोर्ट ने कहा कि विजिलेंस रिपोर्ट भी याचिकाकर्ता के रीति-रिवाजों और दस्तावेजों का समर्थन करती है।

अदालत का अंतिम आदेश अदालत ने स्क्रूटनी कमेटी के आदेश को रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली और वाशिम कमेटी को निर्देश दिया कि आदेश की प्रति मिलने के आठ सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को “कच्छी OBC” का वैधता प्रमाण पत्र जारी किया जाए।