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Monday, June 8, 2026
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जागतिक मातृभाषा दिवस को उपलक्ष मा : मोरी पोवारी बोली

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**पोवारी बोली अना मी : एक पुनरावलोकन
>> मी फरवरी 2013 मा रिटायर भयेव् अना कोनतोच शहर मा स्थायी नही होयस्यार आपलो जन्मगाव/खेडेगाव बोरकन्हार मा पुनर्स्थायी होन् साठी मार्च 2013 पासना आमरो गावमा रव्हन् ला आयेव् सपरिवार।
>> च्यालीस-पैंतालीस साल शिक्षण अना नवकरी को कारन लका बाहेर-बाहेर रव्हेव् होतो मुनस्यारी बचपनकी पोवारी बोली ठीक लका बोलता आवत् नोहोती। अटक-अटकस्यारी बोलत होतो.
>> पर आमरो घरं गावमा एक नवकर होतो, वोको नाव देवाजी रहांगडाले। येनं देवाजीला पोवारी को सिवाय दुसरी कोनतीच भास्या बोलता आवतच् नोहोती। वोकोसंगं पोवारी मा बोलता बोलता मी धीरू धीरू पहलेवानीच धाराप्रवाह पोवारी बोलन् लगेव्।
>> मी झाडीबोली को चळवळ मा 1979-80 पासना कार्यरत सेव्. झाडीबोली साहित्य मंडळ को संस्थापक/आजीव सभासद भी सेव्. तसोच महाराष्ट्र मा बोली जानेवाली सप्पाई बोलीईनको एक अखिल महाराष्ट्र बोली साहित्य महामंडळ को भी मी संस्थापक/आजीव सभासद सेव्. येनं दुही मंडळ का आम्ही हरसाल साहित्य संमेलन लेजेसन् अना झाडीबोली को संगंसंगं महाराष्ट्र मा बोली जानेवाली सप्पाई बोली को लिखित साहित्य ला प्रोत्साहन, प्रचार अना प्रसार करन् को काम कर रह्या सेजन्.
>> मोरो असो पूर्वानुभव को कारणलका मी पोवारी बोली की एक लहानशी पोस्ट 2013 -14 को दरम्यान फेसबुक परा सहजच टाक देयेव्.
>> अना मोला आश्चर्य का धक्का-पर-धक्काच बसन् लग्या.
करीब हजारेक बिन-पोवार अना काही पोवार लोकईननं येनं पोवारी बोली ला सिरफ लाईकच नही करीन, तं मोला अनखी पोवारी बोली की पोस्ट टाकन् साती प्रोत्साहीत भी करीन. बड़ी मिठी, लयदार बोली लगं से मूनस्यारी बिन-पोवार लोकईननं आमरो पोवारी बोली की बड़ी तारीफ करीन. मी तं दंग रह्य् गयेव् येव् रिस्पान्स देखस्यानी!
>> अना असो मंग मी धीरू-धीरू पोवारी बोली चळवळ सुरू करन् को काम मा डाॅ.ज्ञानेश्वर टेंभरे, ॲड.देवेन्द्र चौधरी, सुरेश देशमुख, जयपालसिंह पटले, सी.एच.पटले, छगनलाल रहांगडाले असा सप्पाई पोवारीबोली चाहताईनको संगं जुळ गयेव्. अना अक्तूबर-नवंबर 2018 मा पोवारी/पवारी बोली साहित्य-कला-संस्कृती मंडळ की स्थापना करनो मा आयी. येनं मंडळ द्वारा अजवरी पोवारी/पवारी बोली का पाच अखिल भारतीय पोवारीबोली साहित्य संमेलन यशस्वी करनो मा आया. मौखिक पोवारी बोली ला लिखित रूप मा आनन् को काम सुरू भयेव् अना अजवरी लगभग 100-150 किताबं पोवारी बोली मा प्रकाशित भयी.
>> अजको असो येनं पोवारी बोली को पुनरुत्थान, प्रचार अना प्रसार देखस्यानी एक बोली-अभ्यासक मूनस्यारी मोला बोहुत बोहुत खुशी होय् रही से. मोला भी सबनं आपलो संगं जोड़ लेईन येकोसाठी मी सबको आभारी भी सेव्.
@ॲड.लखनसिंह कटरे
बोरकन्हार-441902, जि.गोंदिया
(20.05.2020/पुनर्लेखन-21.02.2025)

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