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Monday, August 3, 2026
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सांड और बैल

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सांड और बैल

बैल बाजार अपनी पुरी शबाबपर था।
अच्छे अच्छे बैलोकी वहाँ
खरेदी-बिक्री होरही थी ।
कुछ लोगोने वहाँ
एक मदमस्त आवारा सांडको
बेचनेकेलिये लाया।
सांड कुछ मान नहीं रहाँ था।
अपने विद्रोहसे उसने पुरे बजारमे
होहल्ला मचा रखाथा।
आखिर तंग आकर
उन लोगोने उसे कुछ
बुजूर्ग बैलोकेसाथ बांध दिया।
सांड अभिभी बहोत घूस्सेमे था।
तब बुजूर्ग बैल उसे समझाने लगे ।
अरे मुर्ख ! पागल, बेवकूफ,
इतना होहल्ला मत कर,जरा शांती रख,
इसमेही तेरी भलाई है।
अच्छा मालिक देखकर,
अपने आपको बेचनेको राजी हो जा।
तेरी जिंदगी बन जायेगी।
तेरा भला होजायेंगा।
समयपर दाना पानी मिलेंगा।
हाँ सिझनमे कुछ काम जरुर करना पडेगा।
वैसेभी हम बैल
काम करनेकेलियेही पैदा हुये है।
यही हमारा धर्म है।
काम करनेसे तू मरेंगा नही इसकी गँरंटी,
तेरी पेटपानीकी चिंता मीट जायेगी।
तेरा लाईफ सिक्यूअर हो जायेंगा।
तू भागनेकी सोंचता है, क्या ?
आखिर यंहाँसे भागकर तू जायेंगा किधर ?
शहरमें यां तो जंगलमें,
शहरमे जायेगा तो रास्तेपर भटकेगा,
कभी खायेगा,कभी भुखे पेट सोयेगा।
जंगलमे जायेगा तो भरपेट खायेगा,
मगर मौतका डर सतायेगा।
जरा अकलसे काम ले,
अच्छा मौका आया है, फायदा उठा ले,
खुदको बेचनेमेही अकलमंदी है।
सयानोकी तरहा काम कर बेवकुफी मत कर,

सांड बोला,
मै जिस बजारमे बंधा हूँ,
ये बैलोका बजार है।
आजादीप्रिय सांडोका नहीं।
अब मेरेसमान कुछही सांड बचे है।
जिनकी वजहसे तुम्हारा वंश चल रहाँ है।
तुम्हारी कुछ इज्जत बची हुयी है।
क्या तुम्हे मालूम नही,
आजभी इस धरतीपर जंगलमे,
हमारे पुरखे आजादीसे जीरहे है।
और यहाँ तूम बैल बनकर
आदमीके गुलाम होगये हो,
ना भरपेट खासकते हो,
ना आजादीसे घुमफिर सकते हो,
तुम्हे नपुंसक बनाया गया है,
तुम्हारे नाकमे नकेल कसदी गई है,
फिरभी तुम अपनी जिंदगीपर इतरा रहे हो।
और मुझेभी गुलाम बननेकी सलाह देरहे हो।
तुम्हे अभिभी शर्म नही आरही है,
मगर मुझे तो
तुम्हारी गुलामी और लाचारीपर
शर्म आरही है।
शर्म आरही है,मुझे तुम्हारी बैलगीरीपर,
बैलो,……. मुझे डर नहीं मौत का,
मै डरता नही मौतसे
हाँ और मेरे पास सींगभी है मेरी रक्षाके लिये
ये मै भुला नहीं अभीतक,
मगर ,मुझे दुख है,
तुम मौतसेभी बद्तर गुलामीकी, लाचारीकी,
जिंदगी जीरहे हो,और इतराते हो,इसका और
खुश दिखनेका स्वाँग रचाते हो,
बैलो……….मुझे मालूम है।
तुम पुरे नपुंसक होगये हो, लाचार होगये हो,
अपने तन से और अपने मन सेभी।
बैलो…….. मुझे दुख इस बातका नही है की,
तुम्हारे मालिकोने
तुम्हे काम करनेके लिये गुलाम किया,
बैलो……. मुझे दुख इस बातका है की,
तुम अपने मालिकके बातोको सच मानकर,
अपने तन और मनको गुलाम किया है।
आज तुम हमारी आनेवाली जनरेशनके
किसी काम के नहीं रहे।
मै थुकता हुँ,
तुम्हारी लाचार जिंदगीपर,
तुम चाहकरभी अपनी गुलामीके
बाहर नहीं निकल सकते।
वो दम अब तुम्हारेमे नहीं ।
वो औकातभी तुम्हारी नही।
इसिलिये
तुम्हारे मालिक तुम्हारी तारीफ करते है।
तुम्हे अच्छा बोलते है,
मगर मै
किसिका गुलाम नहीं हुँ।
इसिलिये तुम्हारी आजादीकेलिये लडता हुँ।
मुझे तुम्हारे मालिक सोंच समझकर,
मुर्ख, पागल और बेवकूफ ठहराते है।
मुझे मुर्ख,पागल,और बेवकूफ ठहरानेमे
स्वार्थ है, उनका
ताकि,मेरी बातोमे आकर,
कुछ बैल उनके खिलफ विद्रोह ना करदे।
मगर तुम तो मेरे समाजके होकरभी,
मुझे मुर्ख, पागल और बेवकूफ कहते हो,
मगर भुलो मत ,ये तुम्हारे
मन और मस्तिष्कपरहुवा गुलामीका असर है।
मै तुम्हारी नजरमे
मुर्ख,पागल और बेवकूफ ही सही,
मगर मै अपने शरीर और मनकी आजादीको
किसीभी किंमतपर नहीं बेचूंगा।
इसमे चाहे मेरी जानभी गयी तो चलेंगा।
आजादीकी किमत जानसेभी जादा होती है।
गुलाम बनके सौ साल जीनसे बेहत्तर है
शेरके समान आजाद जिंदगी जिकर मरना।
आज तुम्हारे समान बहुजन बैलोको,
सक्त जरुरत है ,
शारिरीक और मानसिक आजादीकी।
मगर तूम समझोगे नहीं।
मनकी गुलामीकी वजहसे ही
हमारे कुछ पढेलिखे बैलभी
गुलाम व्यवस्थाके खिलाफ
ना कुछ करते ना कुछ बोलते ,
उलटे इस गुलामव्यवस्थाका समर्थन करते,
व्यवस्थाके खिलाफ लडनेवाले सांडोको
अक्सर मुर्ख,पागल,
और बेवकूफ कहते रहते है।
वास्तवमे ये साले सब खट्या बैल है।
जो पुरे नाकाम होनेपर
कसाईखानेमे बेंच दिये जाते है।
तुम बैलोसे हम आजाद विचारोके सांड,
कई गूना अच्छे है।
हम व्यवस्थाका मार जरुर खाते है,
मगर आजादीकी जिंदगी शानसे जीते है।
और मरतेभी शानसे है।
तुम्हारे मालिक  आजभी हमसे डरते है।
एक सांड जीसदीन बैल बनजाता है,
उसी दिन उसकी जिंदगी खत्म होजाती है।
बादमे वो जो दिखता है,
वो व्यवस्था ढोनेकी एक मशिन होती है।
जो सिर्फ मालिकके लिए काम करती है,
जैसे तूम हो ।

                   प्रमोद मून
                   9423063127

” गुलामोको गुलामीका एहसास करादो,तब वो विद्रोहकेलिये खडा होगा “
              डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर